नमस्कार दोस्तों।
आज हम बात करेंगे विश्व प्रशिद्ध छठ मइया की। । । जय छठ मईया । ।
:- छठ पूजा से जुड़े कुछ प्रशन और उनके उत्तर।
1. कौन हैं छठ मइया और क्यों मनाते हैं हम छठ पूजा ? अलग अलग जगह पर अलग अलग मान्यताएं हैं कहा जाता है की नवरात्री के छठे दिन पूजे जाने वाली माँ कात्यायनी को ही माँ छठ कहते हैं और यह भी कहा जाता है की छठ मइया ब्रह्मदेव की मानस पुत्री ( Mutant ) हैं। इस पर्व में मुख्या रूप से माँ गंगा और सूर्य देव के साथ माँ छठ की उपासना की जाती है। इस पूजा की शुरुआत कब हुई इसका तो कोई प्रमाण नहीं मिलता लेकिन हिन्दू मान्यता के अनुसार महाभारत के समय में कुंती पुत्र कर्ण छठ पूजा किया करते थे। कर्ण उस समय में अंगदेश के राजा हुआ करते थे जिसे हम अभी के भागलपुर ( बिहार ) नाम से जानते हैं, यही वो मुख्य कारण है जिससे छठ पूजा मुख्यतः बिहार में प्रचलित है।
2. कब मनाते हैं हम छठ पूजा ?
दिवाली के छः दिन बाद छठ पूजा मनाते हैं / कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाते हैं।
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3. छठ पूजा की विधि ?
छठ पूजा मुख्य्तः चार दिवसीय पर्व है जो कुछ इस प्रकार हैं :-
1. नहाय खाय :- छठ पर्व का पहला दिन जो ‘ नहाय-खाय’ है, । इसमें सबसे पहले घर की साफ़-सफाई कर घर को पवित्र किया जाता है। उसके बाद व्रती अपने नजदीक में स्थित गंगा नदी,गंगा की सहायक नदी या तालाब में जाकर करते है। व्रती इस दिन नाखून वगैराह को अच्छी तरह काटकर, स्वच्छ जल से अच्छी तरह बालों को धोते हुए स्नान करती हैं। लौटते समय वो अपने साथ गंगाजल लेकर आते है जिसका उपयोग वह खाना बनाने में करते है । वे अपने घर के आस पास को साफ सुथरा रखती है। खाना में व्रती कद्दू की सब्जी ,मुंग चना दाल, चावल का उपयोग करती है । तेल में तली हुई पूरियाँ पराठे सब्जियाँ आदि वर्जित हैं यह खाना कांसे या मिटटी के बर्तन में पकाया जाता है। मिटटी के चूल्हे का इस्तेमाल किया जाता है। जब खाना बन जाता है तो सर्वप्रथम व्रती खाना खाती है उसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य खाना खाते है ।
2. खरना :- छठ पर्व का दूसरा दिन जो कि खरना है । इस दिन व्रती पुरे दिन उपवास रखते है । इस दिन व्रती अन्न तो दूर की बात है सूर्यास्त से पहले पानी की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते है। शाम को चावल गुड़ और गन्ने के रस का प्रयोग कर खीर बनाया जाता है। खाना बनाने में नमक का प्रयोग नहीं किया जाता है। इन्हीं दो चीजों को पुन: सूर्यदेव को नैवैद्य देकर उसी घर में ‘एकान्त' करते हैं अर्थात् एकान्त रहकर उसे ग्रहण करते हैं। परिवार के सभी सदस्य उस समय घर से बाहर चले जाते हैं ताकी कोई शोर न हो सके। एकान्त से खाते समय व्रती हेतु किसी तरह की आवाज सुनना पर्व के नियमों के विरुद्ध है।
पुन: व्रती खाकर अपने सभी परिवार जनों एवं मित्रों-रिश्तेदारों को वही ‘खीर-रोटी' का प्रसाद खिलाते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को 'खरना' कहते हैं। इसके बाद अगले 36 से 37 घंटों के लिए व्रती निर्जला व्रत रखते है। मध्य रात्रि को व्रती छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद ठेकुआ बनाती है ।
3. संध्या अर्घ्य :- छठ पूजा का तीसरा दिन जिसे सोझका \ संध्या अर्घ कहते हैं आज के दिन ठेकुआ , अलग - अलग प्रकार के फल , चावल के लड्डू इत्यादि सभी चीज़ों को एक बांस की टोकरी जिसे दउरा भी कहते हैं इसमें सभी चीज़ प्रसाद के रूप में रखने के बाद उसे एक रंगी हुई पीली धोती या कोई पवित्र \ नए कपडे से ढक दिया जाता है। और ये जूठा या अपवित्र न हो इसके लिए पूरी पवित्रता से घर के पुरुष इसे सर पर रख कर घाट तक ले जाते हैं।
किसी भी झील , नदी या तालाब के किनारे जहाँ घर के किसी सदस्य द्वारा बनाया गया चबुतरे तक उस टोकरी \ दउरा को ले जाय जाता है और जितनी भी फल , और प्रशाद को चबुतरे पर रखा \ बिछाया जाता है और सभी फल \ प्रसाद साबुत रखा जाता है। जब घर की महिलाएं घात पैर आती है तो बहुत ही प्यारे छठ मइया के गीत गाते जाती हैं और अपने चबुतरे पर जाकर दिया जलती हैं और यहीं कुछ समय बैठ छठ गीत गति हैं और फिर सूर्यास्त से कुछ समय पहले सूर्य देव के पूजन की सारी सामग्री लेकर तालाब , नदी या झील में उतरती हैं और हाथ में नारियल लेकर पांच बार सूर्य देव की परिक्रमा करती हैं। और फिर अर्घ्य देने के बाद अपना सारा सामन और प्रसाद लेकर घर चला जाया जाता है और फिर अगले दिन यानी भोरका अर्घ्य \ उषा अर्घ्य की।
4. उषा अर्घ्य :- चौथे दिन सुबह 1 बजे से ही सब तैयार होने लगते हैं घाट पर जाने के लिए और सभी छठ व्रती भी तैयार होती हैं उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए। परिवार के पुरुष पिछले दिन की ही तरह दउरा ले कर सबसे पहले घाट तक जाते हैं और सभी सामन को पहले की तरह रख देते हैं। सुबह चार बजे से ही घाट पर चलने भर की भी जगह नही होती। लाखों और हज़ारों की तदाद में लोग उगते सूर्य को अर्घ्य देने पहुंचते हैं। सूर्य उदय से पहले ही सभी छठ व्रती गीत गाते घर से आती हैं और सूर्यदेव को अर्घ्य देने के लिए हाथ में नारियल लेकर घाट \ जल में उतरती हैं। और जो लोग इन छठ व्रती के हाथ में रखे नारियल पर दूध का अभिषेक करते हैं उन्हें भी कहा जाता है की सूर्यदेव और छठी मइया का आशीर्वाद मिलता है। आश्मान में सूर्य दीखते ही धीरे - धीरे घाट से बाहर निकलना शुरू हो जाते हैं और तीन दिन के निर्जलीय उपवास का अंत कर पूर्ण भोजन करती हैं। और इस प्रकार इस पावन पर्व का समापन होता है।
* जहाँ समस्त विश्व उगते सूर्य की आराधना ही करती हैं वहाँ पूरे विश्व में एकमात्र लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के ही हैं जो उगते सूर्य के साथ - साथ अस्त होते सूर्य की उपासना भी करते हैं। *
__धन्यवाद __
जय छठ मइया
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